As reported in Dainik Jagran on 30/08/11

साठ पन्ने की रिपोर्ट, 160 पन्नों का खर्चनामा

आशुतोष झा, नई दिल्ली साठ पन्ने की रिपोर्ट और उसके खर्च का ब्योरा 160 पन्नों में! सरकार और गैर सरकारी संगठनों के बीच मधुर संबंध का एक नमूना देखिए। दिल्ली सरकार ने बंधुआ मजदूरों के सर्वे के लिए सभी नियम और शर्तो को दरकिनार कर स्वामी अग्निवेश के बंधुआ मुक्ति मोर्चा को 18 लाख रुपये जारी कर दिए। जैसे आनन-फानन में रुपये जारी हुए, एनजीओ ने वैसी ही बिना किसी मतलब की रिपोर्ट भी जारी कर दी। सर्वे कहां किया गया पता नहीं, लेकिन उसके खर्च का ब्योरा मुकम्मल है। सर्वे में गेहूं, चावल जैसे किराने के साथ-साथ आफिस के टेलीफोन का बिल तक शामिल है। मगर बंधुआ मजदूर कहां थे, कौन नियोजक था, इसका कोई ब्योरा ही नहीं है। दिल्ली सरकार की इस अंधेरगर्दी भरी दरियादिली के पांच वर्ष बाद अब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) इस साठगांठ की जांच करने की तैयारी में है। बात है 2006 की। उस समय दिल्ली सरकार ने यकायक सभी नौ जिलों में बंधुआ मजदूरों के सर्वे के लिए स्वामी अग्निवेश के जंतर-मंतर स्थित संगठन को 18 लाख रुपये की एकमुश्त राशि दे दी। नियम को ताक पर रखते हुए इसके लिए न तो कोई समझौता पत्र तैयार हुआ और न ही कोई नियम व शर्ते। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में डिवीजनल मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया कि इसका फैसला किसी आवेदन के आधार पर नहीं, बल्कि सरकार के स्तर पर हुआ था। शायद यही कारण था कि पूरी राशि एकमुश्त अग्रिम मिल गई। वर्ष 2007 में रिपोर्ट तो आई लेकिन ऐसी जिसे पहली नजर में ही खारिज किया जा सकता है। दरअसल, दिल्ली में 90 फीसदी बंधुआ मजदूर बताने वाली इस रिपोर्ट में यही नहीं बताया गया कि सर्वे आखिर कहां किया गया। रिपोर्ट में एक भी नियोजक का नाम-पता नहीं है। लिहाजा किसी के खिलाफ कार्रवाई का सवाल ही नहीं उठता। सर्वे के लिए दिशा-निर्देश तय करने वालों में प्रमुख रहे पूर्व श्रम सचिव लक्ष्मीधर मिश्रा का कहना है कि ऐसी रिपोर्ट को कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता है। मगर दिल्ली सरकार इस मामले पर कुंडली मारे बैठी है। वहीं स्वामी अग्निवेश ने काफी कोशिशों के बाद भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया। उलटे आरोप मढ़ा कि मुझे कुछ लोग बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। अब जरा स्वामी जी के संगठन की सर्वे रिपोर्ट और उसके खर्च के ब्योरे पर नजर फिराइए। बंधुआ मुक्ति मोर्चा ने साठ पेज की रिपोर्ट पेश की है, लेकिन इस पूरे सर्वे के खर्च का लेखा-जोखा लगभग 160 पन्नों में दिया है। दैनिक जागरण के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार इसमें न सिर्फ जंतर-मंतर स्थित संगठन के टेलीफोन बिल का 38,000 रुपये का भुगतान बताया गया है, बल्कि मजदूरों को खिलाने के नाम पर गेहूं, चावल, आलू, सब्जी, टेंट आदि के भी हजारों रुपये जोड़े गए हैं। हवाई चप्पल तक की रसीद चस्पां है। दूसरी ओर अधिकतर खर्च मुक्ति मोर्चा के अपने वाउचर पर किए गए, जिसमें लाभार्थियों के नाम अधिकतर अस्पष्ट हैं। पांच हजार से ज्यादा के भुगतान पर भी कहीं रसीदी टिकट नहीं है। इस ओर ध्यान दिलाने पर स्वामी अग्निवेश ने अनभिज्ञता जताई और कहा मैं मजदूरों की स्थिति को लेकर गंभीर हूं। उन्हें छुड़वाने के बाद उनका ध्यान रखना पड़ता है। खर्च के लिए क्या हैं दिशा-निर्देश सर्वे के तहत मिली राशि सर्वे के लिए सवाल तैयार करने, सर्वेक्षण में जुड़े लोगों के प्रशिक्षण, डाटा एकत्र करने, उनके संकलन और कंप्यूटरीकरण के लिए ही खर्च की जा सकती है। मजदूरों के पुनर्वास के लिए अलग से मद दी जाती है।

Source:
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/ar...19885871137448
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/ar...99008105058676