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This is a discussion on सूचना के अधिकार का डंडा अफसरों पर चला within the RTI News & Discussion forums, part of the RTI News, Circulars and Decisions category; भोपाल. सूचना का अधिकार सूचनाएं दिलाने से आगे जाकर अब देश भर में लापरवाह अधिकारियों को रास्ते पर ला रहा है। सूचनाएं नहीं देने वाले अधिकारियों पर न सिर्फ अधिकतम ...
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भोपाल. सूचना का अधिकार सूचनाएं दिलाने से आगे जाकर अब देश भर में लापरवाह अधिकारियों को रास्ते पर ला रहा है। सूचनाएं नहीं देने वाले अधिकारियों पर न सिर्फ अधिकतम जुर्माने लगाए गए हैं बल्कि लोगों को सीधे इंसाफ भी दिलाया गया है। पूना में मजदूरों का भुगतान नहीं करने पर गुजरात की एक निजी निर्माण कंपनी को भी सबक सिखाया गया है। हाल ही में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश के सूचना आयोगों के कुछ फैसले इस कानून की अहमियत रेखांकित करने वाले है। अधिकारियों का आम बहाना है कि जानकारी उपलब्ध नहीं है या फाइल गायब है। मप्र के मुख्य सूचना आयुक्त पदमपाणि तिवारी तो ऐसे अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के हामी हैं। उन्होंने भास्कर से कहा कि कोई अधिकारी यह कहकर बच नहीं सकेगा कि जानकारी नहीं है या फाइल नहीं मिल रही। यह जिम्मेदारी निर्धारित करनी ही होगी कि फाइल किसकी लापरवाही से गायब है। हाल ही में उन्होंने एक अफसर पर 25 हजार रुपए का अर्थदंड ठोका है। आयोग ने पिछले चार महीनों में निपटाए कुल मामलों में से 95 फीसदी में फौरन जानकारी देने के आदेश दिए हैं। उत्तरप्रदेश में आयोग ने एक अशिक्षित परेशानहाल महिला का इस कानून की शरण में आना बेहद अहम माना और उसे सूचना से आगे जाकर इंसाफ दिलाने की पहल की। महाराष्ट्र में जनता का अधिकार जनता के ही द्वार ले जाने की जोरदार पहल हुई है। वहां सात सूचना आयुक्त हैं, जिन्हें सात क्षेत्रीय कार्यालयों में पदस्थ किया गया है। यह इसलिए ताकि लोगों को राजधानी तक न दौड़ना पड़े। 25 हजार का जुर्माना: मप्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल से एक स्वयंसेवी संस्था प्रयत्न ने अप्रैल 2006 में अनुदान संबंधी सामान्य जानकारी मांगी। लेकिन महीनों बाद भी मंडल किंतु-परंतु करता रहा। आयोग में अपील हुई और मंडल के लोक सूचना अधिकारी राकेश श्रीवास्तव को जानबूझकर जानकारी नहीं देने का दोषी पाया गया। आयोग ने उन पर 25 हजार रुपए का जुर्माना किया। ये मामूली मामला नहीं : लखनऊ की लालतीदेवी के पति गंगा को उप्र जल निगम ने समय से पहले नवंबर 95 को सेवानिवृत कर दिया। बताया गया कि आयु पांच साल ज्यादा थी। उसे नवंबर 99 को रिटायर होना था। उसकी मृत्यु सितंबर 99 में हो गई। लालतीदेवी ने कई दरवाजे खटखटाए, लेकिन किसी ने एक नहीं सुनी। आखिरकार सूचना के अधिकार का सहारा लिया। मामला सूचना आयोग तक गया, जहां सात सुनवाइयों में ही निराकरण हो गया। आयोग ने दस्तावेज मंगाए और गंगा की सेवानिवृति नवंबर 99 ही मानी। एक अशिक्षित महिला द्वारा सूचना के अधिकार का उपयोग करने को भी आयोग ने अहम माना और नियमों को शिथिलकर दो माह में पांचवे वेतनमान के लाभ सहित सभी भुगतान व अनुकंपा नियुक्ति के आदेश दिए। निर्माण कंपनी भी लपेटे में सूरत की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी ने पूना में सीवेज वॉटर प्लांट का निर्माण किया। करीब 40 श्रमिकों का भुगतान नहीं हुआ। सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई तो नगर निगम और कंपनी एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे। अपील के बाद आयोग ने पाया कि नगर निगम ने रिकॉर्ड मेंटेन नहीं किया और गलत जानकारी दी व गुमराह किया। कंपनी पर 25 हजार रुपए का जुर्माना हुआ और मजदूरों के बकाया आठ लाख रुपए भुगतान के आदेश भी। आयोग ने माना कि प्रोजेक्ट के दौरान कंपनी नगर निगम का ही हिस्सा थी इसलिए वह भी आरटीआई के दायरे में है। 15 साल और 10 दिन सांगली, महाराष्ट्र के श्री वसदडेकर नगर निगम से एक हाउसिंग सोसायटी से संबंधित जानकारी मांग रहे थे। 15 साल से परेशान हुए, कुल 70 बार आवेदन किए, हाईकोर्ट तक गए। निगम का एक ही जवाब था-फाइल गुम हो गई है। सूचना का अधिकार आते ही वे इसकी शरण में आए। लेकिन वही ढाक के तीन पात। अपील आयोग में आई। आयोग ने निगम को तलब किया। जवाब मिला-फाइल गायब है। आयोग को लगा कि दाल में कुछ काला है, सारी फाइलें उपलबध हैं, एक ही गायब है। आयोग ने कहा कि 15 साल में जितने भी अधिकारी रहे उसकी सूची बनाएं और जो जिम्मेदार हों उनके खिलाफ फौरन एफआईआर दर्ज हो। अंतत: 10 दिन में फाइल पेश हो गई। ????? ?? ?????? ?? ???? ?????? ?? ???
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